Monday, August 22, 2011

Police Policy: SC Order: 'फर्जी मुठभेड़ के दोषी पुलिस वालों को मिले फांसी' - सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि फर्जी मुठभेड़ में किसी को मारना हत्या की तरह है और दोषी पुलिस वाले किसी भी तरह से फांसी से कम सजा के हकदार नहीं हैं। कानून हाथ में लेने के लिए उतावले पुलिस वालों को फटकारते हुए शीर्ष कोर्ट ने 23 अक्टूबर 2006 को राजस्थान में एसओजी द्वारा कथित गैंगस्टर दारा सिंह को फर्जी मुठभेड़ में मारे जाने के मामले में फरार दो आईपीएस अधिकारियों (अतिरिक्त डीजीपी अरविंद जैन और एसपी अरशद)को मुकदमे का सामना करने के निर्देश दिए हैं।
जस्टिस मरकडेय काटजू और सीके प्रसाद की बेंच ने सोमवार को कहा कि अगर पुलिस अधिकारी सरेंडर नहीं करते हैं तो मामले की पड़ताल कर रही सीबीआई दोनों को गिरफ्तार कर लेगी। सिंह की विधवा सुशीला देवी ने कहा कि इस मामले में आरोपी पूर्व मंत्री राजेंद्र राठौर भी फरार है। इस पर कोर्ट ने कहा कि उनके लिए भी यही बात लागू होगी।
सुशीला देवी की याचिका पर अप्रैल में कोर्ट ने मामले की सीबीआई जांच के आदेश दिए थे। बेंच ने कहा,‘अगर किसी साधारण व्यक्ति द्वारा अपराध किया जाता है तो साधारण सजा दी जानी चाहिए लेकिन अगर कोई पुलिस वाला अपराध करता है तो उसे कहीं सख्त सजा दी जानी चाहिए क्योंकि उन्होंने अपनी डच्यूटी के विपरीत काम किया है।’


देश में फर्जी मुठभेड़ के मामले : राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 2008-09 से इस साल जून तक कथित फर्जी मुठभेड़ों के 369 मामले दर्ज किए गए। इनमें से 98 को आयोग ने सुलझाया जबकि 271 में अभी कार्रवाई होनी है। 90 मामलों में पुलिस कार्रवाई संदिग्ध पाई गई, आयोग ने मृतकों के परिजनों को 4.54 करोड़ रुपए की मदद देने की सिफारिश की। हाल में जारी रिपोर्ट के मुताबिक उत्तरप्रदेश फर्जी मुठभेड़ों में टॉप पर है जहां पिछले तीन साल में 120 लोगों को पुलिस ने कथित तौर पर मार दिया है।
15 साल में 2560 की मौत
एमनेस्टी इंटरनेशनल की वार्षिक रिपोर्ट कहती है कि 1993 से 2008 की अवधि में पुलिस ज्यादती के कारण कम से कम 2560 लोगों की मौत हो गई। इनमें से 1224 की फर्जी मुठभेड़ में मृत्यु हुई है। लेकिन किसी भी पुलिस वाले को अब तक फर्जी मुठभेड़ में दोषी ठहराकर सजा नहीं दी गई।

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